भारतीय राजनीति में चंद्रशेखर का स्मरण केवल इसलिए नहीं होता कि वे देश के प्रधानमंत्री रहे, बल्कि इसलिए भी कि वे उन नेताओं में थे जिनकी राजनीति का निर्माण पुस्तकालयों, बहसों और साहित्यिक संवादों के बीच हुआ था। आज जब राजनीति का सरोकार प्रायः चुनाव, प्रचार और प्रबंधन तक सिमटता दिखाई देता है, तब चंद्रशेखर का व्यक्तित्व यह याद दिलाता है कि राजनीति का एक वैचारिक और सांस्कृतिक पक्ष भी होता है। और यह किसी चुनावी जीत या हार से कम महत्वपूर्ण नहीं होता।
चंद्रशेखर जितने प्रभावशाली वक्ता थे, उतने ही गंभीर पाठक और लेखक भी. भारतीय ही नहीं, विश्व साहित्य पर भी उनकी गहरी दृष्टि रहती थी।
एक राजनेता होने के साथ-साथ साहित्य और भाषाई संस्कार से चंद्रशेखर का गहरा लगाव रहा।
विश्व साहित्य की अनेक कृतियों की उन्होंने अपने ठेठ गाँव-गँवई अंदाज़ में विवेचना की। उनका हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था।
हिन्दी और अंग्रेज़ी में उनके हस्तलिखित तथा स्वयं संपादित कुछ लेख आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं, जो इस बात के साक्षी हैं कि वे केवल एक अच्छे लेखक ही नहीं, बल्कि कुशल संपादक भी थे। जेल डायरी उनकी एक ऐसी अनूठी पुस्तक है जो उनमें एक संपूर्ण लेखक होने के गुण दर्शाती है. यह केवल एक राजनीतिक संस्मरण नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व और चिंतन का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है।
वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने उनकी जेल डायरी पर अपनी एक टिप्पणी में कहा था कि डायरी तो राजेंद्र प्रसाद ने भी लिखी लेकिन उन्हें शिवपूजन सहाय जैसे समर्थ सहयोगी मिल गए थे। लेकिन चंद्रशेखर को शायद इसकी जरूरत भी नहीं थी। चंद्रशेखर की जेल डायरी में राजनेता के साथ-साथ एक संवेदनशील और आत्ममंथन करने वाला बेचैन मन भी दिखाई देता है।
उनके राजनीतिक संस्कारों की नींव समाजवादी चिंतक आचार्य नरेंद्र देव ने रखी। नरेंद्र देव ने उनमें केवल एक सक्रिय कार्यकर्ता नहीं, बल्कि एक विचारवान सार्वजनिक व्यक्ति देखा। यही कारण था कि चंद्रशेखर की राजनीति में वैचारिक स्पष्टता थी, लेकिन कट्टरता नहीं। वे असहमति को लोकतांत्रिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मानते थे और संवाद के दरवाज़े कभी बंद नहीं करते थे।
जुलाई 1997 की एक दोपहर मुझे पहली बार चंद्रशेखर से मिलने का अवसर मिला। तब तक मुझे यह अनुमान नहीं था कि आगे चलकर लगभग दस वर्षों तक ‘यंग इंडियन’ के माध्यम से उनके साथ निकटता से काम करने और उन्हें जानने-समझने का अवसर मिलेगा।
पहली और बाद की तमाम मुलाक़ातों की जो स्मृतियाँ ज़हन में उभरती हैं, उनमें एक यह कि, वह लोगों की बात बहुत धैर्य से सुनते थे। और, अक्सर जब लोगों को सुनते उनकी नज़रें ज़मीन पर कुछ टटोल रही होती थीं। यहाँ यह बात भी उल्लेखनीय होगी कि वह साहित्य को राजनीति के नैतिक विवेक का आधार मानते थे।
‘यंग इंडियन’ के संपादकीय के विषय के चयन को लेकर जो साप्ताहिक बैठकें होती थीं उनमें बातचीत के दौरान वे सहज ही किसी कवि, लेखक या दार्शनिक का उल्लेख करते और फिर उसी संदर्भ से समकालीन राजनीति की व्याख्या करने लगते। उन बैठकों में वे बहुत कम बोलते थे, लेकिन जितना भी बोलते, वह विषय तय करने के लिए पर्याप्त होता था और उसके बाद बैठक समाप्त हो जाती थी।
बाद के सालों में ऐसी बैठकें कम होती चली गईं, चूँकि यंग इंडियन की शुरुआती टीम साज़िशों का शिकार होकर बिखर गई थी। उस टीम के प्रति बाद में पत्रिका से जुड़े एक वरिष्ठ पत्रकार की घृणा या कहूँ कि असुरक्षा की भावना इतनी प्रबल हो गई थी, उन्होंने नरेंद्र निकेतन की गैलरी में खड़े होकर एक अन्य पत्रकार जो महिला थी उसके लिए एक ऐसे शब्द का प्रयोग किया जिसे यहाँ लिखना मैं उचित नहीं समझता। इसका परिणाम यह हुआ जो पत्रिका अपने शुरुआती कुछ सालों में संसद के सवाल-जवाबों से लेकर सेंटर हाल के गॉसिप का विषय बनती थी, देखते ही देखते बाद के सालों में अखबारों की जुगाली बनकर रह गई। कम से कम तीन लेख तो मुझे ही हर सप्ताह छ्द्म नाम से लिखने पड़ते थे।
बहरहाल, चंद्रशेखर से मिलने आने वालों में केवल नेता ही नहीं, लेखक, कवि, पत्रकार और कलाकारों की बड़ी संख्या होती थी। उनका विश्वास था कि किसी समाज को उसकी संवेदना ही बचाती है और साहित्य उस संवेदना का सबसे सशक्त माध्यम है। यही कारण था कि वे साहित्यकारों का सम्मान केवल सहमति के कारण नहीं, बल्कि उनकी वैचारिक स्वतंत्रता के कारण भी करते थे। उन्हें ऐसे लेखक प्रिय थे जो सत्ता से असहज सवाल पूछने का साहस रखते हों।
‘यंग इंडियन’ उनकी इसी दृष्टि का विस्तार थी। वह केवल राजनीतिक टिप्पणियों का मंच नहीं थी, बल्कि ऐसा सार्वजनिक मंच थी जहाँ राजनीति, साहित्य, समाज और संस्कृति पर गंभीर विमर्श होता था। आज जब असहमति को संदेह और आलोचना को विरोध के रूप में देखा जाने लगा है, तब यंग इंडियन की परंपरा और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है।
मुझे अच्छी तरह याद है, ‘यंग इंडियन’ की दूसरी ही बैठक थी। और तब तक यह साफ़ हो चुका था कि पत्रिका अंग्रेजी के साथ हिन्दी में भी प्रकाशित होगी। हालांकि इस बात से हमारे प्रकाशक डॉ एस के गोयल प्रसन्न नहीं थे। चूँकि, मेरा दायित्व हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के संस्करण में किसके लेख आदि जाएंगे उनसे संपर्क कर समय पर लेख लिखवाना था।
यह बात यंग इंडियन में काम की शुरुआत के पहले ही शरद द्विवेदी (दैनिक भास्कर) ने मुझे समझा दी थी। ख़ैर, जब उस मीटिंग में मैंने सवाल किया कि किन-किन लोगों से लेख लिखवाए जाने हैं, तब जो कुछ नाम चंद्रशेखर जी ने बताए, उनमें दो-तीन नाम भाजपा नेताओं के भी थे, जिनमें मुरली मनोहर जोशी का भी नाम था। वह लिस्ट आज भी किताब-कापियों में कहीं रखी होगी। कहने का तात्पर्य यह है कि, वह उन व्यक्तियों को भी अपनी पत्रिका में जगह देने को तैयार थे, जो वैचारिक तौर पर उनसे असहमत थे।
आज उनकी पुण्यतिथि पर चंद्रशेखर को याद करना केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति का स्मरण भी है जिसमें नेता किताबें पढ़ते थे, लेखकों से बहस करते थे, कवियों को सुनते थे और आलोचना और असहमति को लोकतंत्र की शक्ति मानते थे।
चंद्रशेखर उस पीढ़ी के प्रतिनिधि नेताओं में थे, जिनके लिए संसद, समाज और साहित्य एक-दूसरे से जुड़े हुए क्षेत्र थे। वे मानते थे कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि विचार, संवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्र संस्कृति से भी संचालित होता है। शायद यही कारण है कि आज, जब सार्वजनिक जीवन में वैचारिक संवाद का दायरा लगातार सिमटता दिखाई देता है, तब चंद्रशेखर का व्यक्तित्व और उनकी बौद्धिक विरासत पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक महसूस होती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और पूर्व में एक दशक तक पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की पत्रिका यंग इंडियन के प्रभारी रहे हैं।)